मैं एक खाते-पीते घर की इकलौती औलाद हूं। मेरा नाम फरजाना है। मेरे वालिद के एक दुर्घटना में मारे जाने पर मेरी मां को एक लाख का क्लेम मिला। साथ ही उन्हें वह नौकरी भी मिल गई जिस पर वालिद साहब काम कर रहे थे। हमारी माली हालत ठीक बनी रही। मेरी मां ने समय आने पर एक सम्पन्न परिवार के ऐसे लड़के से मेरा निकाह कर दिया जो एक फैक्ट्री में मैनेजर था। उसकी तनख्वाह अच्छी खासी थी।
मैं ब्याह कर आयी तो मेरी काफी कद्र हुई। कद्र की वजह मेरा रूप और सौन्दर्य था। अच्छी कद-काठी, भरा-पूरा बदन, गोरा रंग, मखमली गाल, कटीली आंखें। मैं दिवंगत फिल्म अदाकारा सुरैय्या की तरह दिखती थी। इसलिए मेरी सखियां मुझे सुरैय्या कह कर पुकारती थी। मेरा शौहर अनवर मुझसे जरा हल्का पड़ता था - दुबला-पतला शरीर, झेंपू स्वभाव, देखने में कोई खास खूबसूरत नहीं। सुहागरात को वह मेरे पास जरा झिझकते-झिझकते आया। मैंने उसे खुश करने के लिए पत्नी-धर्म का निर्वाह किया। ... जब वह एक मिनट में ही मेरे ऊपर से उतर गया तो मेरे लिए तो वही बात हुई कि ओस चाटने से कहीं प्यास बुझती है? अनवर खुद शर्मिंदा था। उसने मेरी खुशामद करते हुए कहा, ‘‘बेगम, मैं दवा कर रहा हूं ... जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा ... मैं अभी निकाह करने को तैयार नही था। चालीस दिन का कोर्स हकीम जी ने बताया था। अभी दस दिन का ही कोर्स हो पाया था कि घर वालों ने ब्याह कर दिया। हकीम जी ने बताया है कि चालीस दिन के कोर्स के बाद मैं अपनी खोई हुई मरदाना ताक़त पूरी तरह से वापस पा लूंगा।’’
अनवर ने बताया कि गलत आदतों का शिकार होने की वजह से वह काफी हद तक नपुंसकता का शिकार हो गया था। इलाज करने वाले किसी हकीम ने उसके दिल में यह मनोवैज्ञानिक डर बिठा दिया था कि वह अभी औरत के लायक नही है। अनवर मुझे कुछ न बताता तो मैं नोटिस भी न लेती। मैं जानती थी कि पहली बार मदों के साथ ऐसा हो जाता है। यह मेरा पहला पुरूष-संसर्ग नही था। शादी से पूर्व भी मैं यौनसुख भोग चुकी थी। दरअसल कुंवारेपन में अच्छा खानदान व घर में कुछ काम न होने की वजह से मेरा दिन हमउम्र लडकियों से बातें करते बीतता था। उनकी कामक्रीड़ा और यौन-आनंद की बातें मेरे जेहन में हर दम गूंजती रहती थी। साथ ही कुछ मासिक गडबड़ी तथा वालिद के इन्तकाल के कारण मैं दिमागी तौर पर अपसेट हो गई और मुझे दौरे पड़ने लगे।
पास-पड़ोस की जाहिल औरतें कहने लगी कि मेरी खूबसूरती की वजह से मुझे पर जिन्नात का साया पड़ गया है। इधर-उधर के इलाज से कोई फायदा नहीं हुआ तो एक तांत्रिक शब्बीर शाह को बुलाया गया। वे दस दिन तक मेरे घर रहे। झाड़-फूंक के बाद उन्होंने बताया कि मुझ पर पीपल वाले जिन्नात का साया है। जिन्नात काफी सख्त है और उनका असर धीरे-धीरे उतरेगा। वे न जाने क्या-क्या करते रहे। लोहबान, धूपबत्ती, फूल-माला, सिन्दूर, खोपड़ी रख कर अजीब-सा डरावना वातावरण पैदा करते। कभी चिमटा मार कर तो कभी मेरे सिर पर झाडू फिरा कर सुबह-शाम जिन्नात उतारते।
इस तरह दो दिन गुजर गए। तीसरे दिन वे मुझे अकेले उस कमरे में ले गये जिस में उन्हें ठहराया गया था। उन्होंने कमरा बंद कर दिया। कुछ देर झाड़-फूंक करने के बाद वह मुझसे रौबदार आवाज में बोले, ‘‘नाड़ा खोलो।’’
वहां खुटियों पर उन्होंने कुछ नाड़े बांध रखे थे जो मैं नही देख पायी थी। लिहाजा मै अनजाने में झट से अपनी सलवार का नाड़ा खोल बैठी। वो समझे कि मैं उन्हें निमंत्रण दे रही हूं। उन्होंने आव देखा न ताव और मुझे जकड़ कर अपने वर्ज़िशी बदन के साथ ज़ोर से लिपटाया और भींच लिया। जिन्नात उतारने वाले मंत्रों के बीच वे कोई पन्द्रह मिनट तक मुझे चूमते, चाटते और चूसते रहे। मुझ पर एक नशा सा छाने लगा। उनके हाथ मेरे जिस्म पर यहां-वहां फिसल रहे थे और मेरी मस्ती को और बढ़ा रहे थे। फ़िर उन्होंने कुछ मन्त्र बोलते हुए मेरी कुर्ती उतार दी। दो मिनट तो उन्होंने मेरी ब्रा से ढकी छाती पर हाथ फिराया और फिर ब्रा का हुक खोल दिया। मेरे उठे हुये स्तन ब्रा की क़ैद से आज़ाद हो गये। शब्बीर शाह ने ब्रा को मेरे जिस्म से अलग कर दिया।
उन्होंने फिर से मुझे अपनी आगोश में लिया तो मेरी नंगी छाती गुदगुदा गई। उन्होंने मेरी चूचियाँ ज़ोर-ज़ोर से मसलना और दबाना शुरू कर दिया। मैं खुशी से बेहाल थी। उन्होंने मुझे लिटा कर अपना मुंह मेरी चूंची पर रख दिया। वे उसे चूस और चाट रहे थे और मेरी दूसरी चूंची को अपने हाथ से सहला रहे थे। मुझे जिन्नात उतारने का यह तरीका बहुत मज़ेदार लग रहा था। जब उन्होंने देखा कि मुझ पर मस्ती छा रही है तो खड़े हो कर वे खुद भी मादरजात नंगे हो गए।
मैं पहली बार एक जवांमर्द का लंड देख रही थी। उनका लंड काफी लम्बा, मोटा और कड़ा दिख रहा था। मैंने सुन रखा था कि इस तरह का लण्ड लड़कियों को बहुत मज़ा देता है। मैं पनिया चुकी थी और मेरी मस्ताई हुई चूत उनके लंड का इंतजार कर रही थी। लेकिन शब्बीर शाह ने अपना टन्नाया हुआ लंड मेरे दोनो स्तनों के बीच दबा कर पेलना शुरू कर दिया। उनका लम्बा लोड़ा मेरे पुष्ट स्तनों के बीच से आगे निकल कर मेरे होंठों पर दस्तक देने लगा। जब वो मेरे मुँह से छूता तो मैं काम-विभोर हो कर उसका सुपाडा चूस लेती।
कुछ देर चूंची-चोदन और मुख-चोदन करने के बाद वो नीचे खिसके और उन्होंने मेरी योनि को चूमना और चाटना शुरू कर दिया। वो मेरे भगोष्ठों के बाहरी मांसल भाग को भी चूस रहे थे। मैं उनके जिह्वा-चोदन से पूरी तरह मस्ता गई थी और मुझे तीव्र चुद-चुदी लग चुकी थी। अनुभवी शब्बीर शाह ने मेरी अवस्था को भांप लिया। उन्होंने मेरी चूत को अपने थूक से तर कर दिया और मेरी जांघें फैला कर उनके बीच बैठ गए। उनका बलिष्ठ लण्ड भी बिल्कुल ताड़ के पेड़ की तरह ऊपर उठ चोदने के लिए तत्पर हो चुका था। उन्होंने अपने लंड को मेरी चूत से सटा दिया। मेरी मचलती हुई चूत लण्ड का स्वागत करने के लिए आतुर थी पर जैसे ही उन्होने एक ज़ोरदार धक्का मारा, मैं सील-भंग के दर्द से सिसक उठी। सील-भंग से मेरी हालत खस्ता देख कर शब्बीर शाह ने बड़ी नरमी से प्यार कर-कर के मुझे सम्भाला।
जब मेरा दर्द कम हुआ तो शब्बीर शाह ने धीरे-धीरे धकियाते हुए अपना समूचा लण्ड मेरी बेहद सँकुचित चूत के अन्दर घुसा दिया। फिर उन्होंने मुझे हलके-हलके धक्कों से चोदना शुरू कर दिया। ज़ल्द ही मुझे चूत में दर्द का एहसास कम और चुदाई का नशा कहीं ज़्यादा महसूस होना प्रारम्भ हो गया। मैं नीचे से अपनी चूत उछाल-उछाल कर उनके लण्ड को गपागप निगलने लगी। मेरी काम-चेष्टा से शब्बीर शाह जोश में आ गए और उन्होंने मुझे पूरी ताक़त से पेलना शुरू कर दिया।
वे फचाफच्च धक्के मार रहे थे और मैं जन्मों से प्यासी मछली की तरह तड़पती हुई उनसे चुदवा रही थी। वे तन्मयता से एक पगलाये सांड की तरह अपना लण्ड धकेल-धकेल मेरी नव्-उद्घाटित चूत को चकनाचूर करने में लगे थे और मेरी कसी हुई चूत उनके धुरंधर लण्ड को चाव से ग्रहण कर रही थी। आश्चर्य था कि आधे घंटे बाद भी न तो हम दोनों का मन भर रहा था और न ही भोग-वासना में डूबे हमारे शरीर थक रहे थे। ... चुदाई के चरम शिखर पर पहुँचने पर उनके लंड ने पिचकारी की तरह मेरी चूत में पानी की बरसात शुरू कर दी। गर्म वीर्य की बरसात से मेरी चूत गुदगुदा कर निहाल और निढाल हो गई। ... उस दिन उन्होंने तीन बार मेरे जिन्नात उतारे .... इस दौरान उन्होंने मुझे वह आनन्द दिया कि मेरा रोम-रोम प्रफ़ुल्लित हो गया।
अगले चार दिनों तक वे सुबह-शाम दो घण्टे जिन्नात उतारने के बहाने मुझे अपने कमरे में ले जाते और सम्भोगरत हो कर मेरी नस-नस ढीली कर देते। अब किस भूत और जिन्न की हिम्मत थी कि वो शब्बीर शाह के सामने मेरे पर चढ़े! मैं पूर्णतया स्वस्थ हो गयी क्योंकि मुझे जिस मर्ज की दवा चाहिए थी वह मुझे मिल गयी थी। एक दिन आनंद के क्षणों में मैं शाह से बोली, ‘‘आप चले जाइएगा तो मेरा क्या होगा?’’
‘‘पूरे दस दिनों का समय बिता कर जाऊंगा। फिर तीन महीने और इलाज चलेगा। तुम्हारी अम्मी हफ्ते में एक बार तुम्हें ले कर मेरे पास आती रहेगी। हमारा एक दिन तक मिलन हर हफ्ते होता रहेगा। फिर कोई और रास्ता देख लेना या तब तक तुम्हारी शादी हो जायेगी।’’
ऐसा हुआ भी। मेरी मां तीन महीने तक मुझे उनके पास ले जाती रही। जिन्नात उतारने के बहाने शब्बीर शाह दिन में तीन-चार बार मेरी कामाग्नि पर अपने पानी की बौछार कर देते। मेरे चेहरे पर लाली और रौनक वापस आने लगी तो मां को यकीन हो गया कि शाह की तांत्रिक शक्तियां जिन्नात पर काबू पाने में सफल हो रही हैं। इलाज पूरा होने के बाद मां ने बताया कि इलाज की फीस दस हजार रूपये थी। पर वे सन्तुष्ट थी कि मैं जिन्नात के चंगुल से आज़ाद हो गई थी।
इस बीच मेरी शादी की चर्चा भी चल पड़ी। कोई साल भर शादी की चर्चा चलती रही और मैं अपने भावी शौहर की कल्पना में खोई रही। शौहर जैसा मिला आपको बता ही चुकी हूं। अब मैं इंतजार कर रही हूं कि हकीम साहब का इलाज कामयाब हो और मैं चुदाई का सुख फिर से पा सकूं। साथ ही डरती भी हूं कि इलाज नाकामयाब साबित हुआ तो क्या होगा। फिर तो एक ही रास्ता दीखता है - मैं दौरे पड़ने का नाटक करूं और अम्मी को कहूं कि शब्बीर शाह को फिर से मेरा इलाज करने के लिए भेज दें। इस बार इलाज की फीस भी मेरा शौहर देगा!
समाप्त
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